Friday, March 14, 2014

संघ का सिद्धान्त



आज मैं यहाँ संघ के सिद्धान्त के बारे में कुछ कहना चाहता हूँ। अरे घबराइये नहीं मैं आर. एस. एस. के किसी सिद्धांत की बात नहीं कर रहा। मैं तो बात कर रहा हूँ गणित के संघ सिद्धांत की। यह सिद्धांत बहुत कुछ जोड़ की तरह है बस इसमें समूहों की बात होती है। मसलन, अगर एक समूह स्वरों का हो और एक व्यंजनों का तो उनका संघ होगा दोनों का समावेश यानी वर्णमाला।

इसी तरह अगर कुछ दिलचस्प समूहों का संघ निकाला जाए तो नतीजे भी काफी दिलचस्प आयेंगे और आयेंगे भी या नहीं पता नहीं। जैसे कि अगर एक समूह बनाया जाए सभी प्रेमी युगलों का और एक समूह बनाया जाए शिवसेना, बजरंग दल, श्रीराम सेना तथा विश्व हिन्दू परिषद् का, तो इनका संघ क्या होगा? क्या एक ऐसा समूह जिसमें सभी शामिल हों? लेकिन क्या ये शिवसेना और बजरंग दल वाले इस नए समूह में प्रेमी-प्रेमिकाओं को रहने देंगे? गणित के सारे नियमों को धता बताते हुए उन्हें इस 'रेज़लटैन्ट' समूह से खदेड़ न देंगे? वो भी बाक़ायदा उनके मुंह पर कालिख पोत कर!! भारतीय संस्कृति की 'रक्षा' तो वे वहाँ भी करेंगे ही।

वैसे प्राचीन भारत में गणित के क्षेत्र में काफ़ी शोध हुआ करता था। शून्य की खोज भारत में हुई और फिर इसका अनुप्रयोग भी हमनें अपनी तमाम सरकारी और गैर सरकारी योजनाओं के नतीजों के रूप में प्रचुरता से किया। भई बाक़ी कोई देश करे न करे हम तो करेंगे ही, नहीं तो ये दुनिया वाले कहेंगे नहीं कि एल्लेल्लो, जब ये लोग खुद ही अपनी इतनी बड़ी खोज का इस्तेमाल नहीं कर रहे तो फिर हम भला क्यों करें इस शून्य का इस्तेमाल। हमारे इतनी व्यापक मात्रा में शून्य के इस्तेमाल को देखकर ही तो बाद में इस शून्य का तालिबान ने भी अपनी उदारता के लिए और जॉर्ज बुश साहब ने भी अपने आई. क्यू. के लिए प्रयोग किया, और प्रयोग भी क्या खूब किया। अपनी इस खोज पे हमें गर्व है और हमेशा रहेगा।


अब हालांकि इस संघ के सिद्धांत की खोज हमारी इस गौरवशाली धरती पर तो नहीं हो सकी पर इसके अनुप्रयोग तो हमने ही सबसे ज्यादा किये हैं। एक उदाहरण से अपनी बात स्पष्ट कर रहा हूँ। किसी शोध ने कभी कहा था कि बच्चों को स्कूल में यूनिफार्म पहनना चाहिए ताक़ि उनमें एक दुसरे के कपड़े देख कर किसी तरह का 'कॉम्प्लेक्स' ना आ जाए। तो जी हमने स्कूलों में लगा दी यूनिफार्म। सभी प्राइवेट स्कूलों के 'बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स' का ये नया 'साइड बिज़नस' चमक गया। यूनिफार्म के साथ साथ फिर वे कॉपी, किताब, पेन, पेंसिल, स्कूल बैग और यहाँ तक कि जूते मोज़े भी बेचने लगे। आमदनी भी दिन दूनी रात चौगुनी हो गयी। फिर मार्किट में लांच हुई एक और शोध। इस नयी शोध ने कह दिया कि अगर बच्चों को अपने रोज़ के कपड़े अपनी पसंद से चुनने की स्वतंत्रता दी जाए, तो इससे बच्चों में निर्णय लेने कि क्षमता बढ़ती है। अब स्कूल प्रशासन धर्म संकट में। अब तक तो साइड बिज़नस मेन से ज़्यादा फ़ैल चुका था। क्या किया जाए? तब गणित के एक प्रोफेसर साहब ने संघ के इस सिद्धांत का आईडिया सुझाया। नतीजा निकला कि बच्चे हफ्ते में चार या पांच दिन यूनिफार्म में आकर अपने ज़ेहन में किसी तरह के काम्प्लेक्स को पनपने से रोकेंगे और एक या दो दिन गैर यूनिफार्म आकर अपनी किसी 'डिसिशन मेकिंग एबिलिटी' को बढ़ा सकें तो बढ़ा लें। तो देखा आपने किस तरह संघ के सिद्धांत ने दोनों का समावेश कर लिया। ये तो वही बात हुई न कि चित मैं जीता और पट तू हारा।

अब हमारा प्यारा देश तो वैसे भी अनेकता में एकता की बात सदियों से करता आया है। तमाम राजनीतिक पार्टियां भी आये दिन इसका आलाप लगाती रहती हैं। संघ के इस सिद्धांत को हमने अपनी आत्मा में रचा-बसा लिया है। हमारी सभी राजनीतिक पार्टियों ने भी जिस तरह चोरों, गुंडों, लुटेरों, हत्यारों, भ्रष्टाचारियों, जातिवादियों, साम्प्रदायिक लोगों को राजनीति की मुख्य धारा से जोड़ा, मैं तो कहूंगा कि वह इस संघ सिद्धांत की सबसे उम्दा मिसालों में से एक है। और वैसे भी ऐसा कर के इन पार्टियों ने संविधान की मूल भावना की रक्षा ही तो की है। जोड़-तोड़ की राजनीति, माफ़ कीजिये 'कोएलिशन गवर्नमेंट' भी तो इसी संघ सिद्धांत के एक और अनुप्रयोग का ही परिणाम है।


और यहाँ तक कि हममें से हर एक अपने-अपने अंतर्मन में भी इस सिद्धांत का पालन बराबर एवं पूर्ण निष्ठा के साथ करता है। हम टैक्स चोरी करते हैं फिर काले धन पे बवाल भी मचाते हैं। टी. टी. को, ट्रैफिक पुलिस को, चपरासियों व अधिकारिओं को घूस देते हैं लेकिन जब कोई बेचारा जंतर-मंतर पर अनशन करने बैठ जाता है तो हम इसी सिद्धांत का उपयोग करते हुए वहाँ भी चले आते हैं। पायरेटेड विंडोज से फेसबुक और ट्विटर पे भ्रष्टाचार के खिलाफ कमेंट और ट्वीट मारते हैं। अब कोई इसे हिपोक्रिसी कहे तो कहता रहे हमारी बला से। क्या पता कल को हम उनकी भीड़ में भी शुमार हो जाएँ इसी सिद्धांत का उपयोग कर के।

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